कोरबा. पहाड़ों और घने जंगलों से घिरे ग्राम ठाकुरखेता की जनसंख्या भले ही बहुत कम है लेकिन यहा प्रकृति ने ग्रामीणों को तेदूपत्ता अर्थात हरे सोने का ऐसा उपहार दिया है कि यहां रहने वाले अनेक ग्रामीणों को गर्मी के दिनों में अधिक से अधिक रूपया कमाने का मौका मिलता है. यहां संग्रहित होने वाला तेंदूपत्ता सबसे अधिक कीमत में खरीदा जाता है. ठाकुरखेता के तेंदूपत्ता की डिमांड अधिक होने की वजह से यहा के ग्रामीण हरासोना संग्रहण कार्य में रूचि दिखाते हैं.
प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की तरफ से पिछले साल तेंदूपत्ता संग्राहकों को प्रति मानक बोरा 1800 रूपये दिए जाने के बाद इसकेा लेकर ग्रामीणों में उत्साह जगा है. यहां रहने वाले ग्रामीण राजकुमार राठिया भी ऐसे तेंदूपत्ता संग्राहक है जिसने जिले में सबसे ज्यादा राशि 68 हजार तीन सौ रूपये वर्ष 2016 सीजन में तेंदूपत्ता बोनस के रूप में मिला है. संग्रहण कार्य के अलावा एक बड़ी राशि बोनस के रूप में मिलने से राजकुमार बहुत खुश है. वह इस राशि से घर में कुछ जरूरी सामान खरीदनें के साथ अपने बेटियों को अच्छे से पढ़ाकर उसका भविष्य संवारनें में खर्च करने की तैयारी कर रहे हैं.
कोरबा विकासखंड के अंतर्गत आने वाले पतरापाली ग्राम पंचायत के आश्रित ग्राम ठाकुरखेता में लगभग 136 तेंदूपत्ता संग्राहक हैं. यहां रहने वाले संग्राहक राजकुमार ने बताया कि वह और उसकी पत्नी अशोकी बाई गर्मी के दिनों में तेंदूपत्ता तोड़ने का काम करते हैं. गतवर्ष 2016 में 19 बोरा से अधिक संग्रहण किया था. इसके एवज में लगभग 3547 रूपये की दर से 68 हजार 385 रूपये बोनस के रूप में उसके खाते में प्रदान की गई.
राजकुमार ने बताया कि उसे नही मालूम था कि जिले में उसे ही सबसे ज्यादा राशि दी गई है. जब वन विभाग के माध्यम से मालूम हुआ और धर्मजयगढ़ में आयोजित बोनस तिहार कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा जब प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया गया तो उसे बहुत खुशी हुई.
राजकुमार ने बताया कि वह पिछले कई साल से तेंदूपत्ता संग्रहण का कार्य करता आ रहा हैं. इससे मिलने वाले रूपयों से वह घर का सामान खरीदता है. घर पर एक फ्रीज भी बोनस राशि से लिया था. अभी अपने खेत में सब्जी उगाने के लिये भी बोनस की कुछ राशि खर्च करेगा. बाकी राशि अपनी बेटियों को अच्छे से पढ़ाने के लिये खर्च करेगा. उसने बताया कि अपनी बड़ी बेटी दिलेश्वरी को अच्छे से पढ़ाने के लिये उसने कोरबा शहर के शासकीय आश्रम में दाखिल भी करा दिया है.
बालक यादव को नहीं लेना पड़ेगा कर्ज
इसी गांव के बालक राम यादव को तेंदूपत्ता बोनस के रूप में 58 हजार 800 की राशि मिली है. बालक राम यादव की पत्नी राजकुंवर ने बताया कि बोनस राशि से वे अपने बेटे का विवाह संपन्न करायेंगे. शासन द्वारा तेंदूपत्ता बोनस राशि दिये जाने से उन्हें अपने बेटे के विवाह के लिए किसी से कर्ज लेने की नौबत नहीं आएंगी.
क्या होता है तेंदूपत्ता :
छत्तीसगढ़ एक प्रमुख तेंदूपत्ता ( डायोसपायरस मेलेनोक्ज़ायलोन की पत्तियां) उत्पादक राज्य है. ये पत्ते तेंदू के वृक्ष (डायोसपायरस मेलेनोक्जायलोन) से प्राप्त होते हैं जो इबेनेसी परिवार का पौधा है एवं भारतीय उप महाद्वीप की प्रजाति है. डायोसपायरस मेलेनोक्जायलोन (डायोसपायरस टोमेन्टोज़ा एवं डायोसपायरस टुपरू) समस्त भारत में शुष्क पर्णपाती वनों की एक मुख्य प्रजाति है. यह नेपाल, भारतीय पठार, गंगा के पठार, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिमी समुद्री तट में मलाबार तक तथा पूर्वी समुद्री तट में कोरोमंडल तक पाई जाती है। यह प्रजाति दक्षिण में नीलगिरी एवं सैरावली पहाड़ों में भी पाई जाती है.
तेंदूपत्ता अपने आसानी से लपेटे जाने वाले गुण एवं अत्यधिक उपलब्धता के कारण बीड़ी बनाने के लिये सर्वाधित उपयुक्त पत्ता माना जाता हैर्. देश के कई हिस्सों मे पलाश, साल आदि प्रजातियों के पत्ते भी बीड़ी बनाने में उपयोग किए जाते हैं. बीड़ी उद्योग में इसका व्यापक उपयोग मुख्यतः इसके आग को जलाये रखने की क्षमता पर आधारित है. मौटे तौर पर जिन गुणों के कारण इस पत्ते को बीड़ी बनाने के लिये चयन एवं श्रेणीकरण किया जाता है वे हैं- आकार, पत्ते का मोटापन, Texture, मुख्य एवं सहायक नसो की परस्पर तुलनात्मक मोटाई.
बीड़ी बनाना एक प्राथमिक कार्य है जो बहुत ही आसान है तथा किसी भी स्थान पर किसी भी समय किया जा सकता है. लाखों ग्रामवासियों के लिये यह अतिरिक्त आय का एक प्रमुख साधन है. बीड़ी उद्योग के कारण ग्रामीणों को खाली समय में तेंदूपत्ता संग्रहण कार्य से रोजगार मिलता है. इस प्रकार ग्राम कल्याण एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास में बीड़ी उद्योग का एक महत्वपूर्ण स्थान है.
तेंदूपत्ते के संग्रहण एवं प्रसंस्करण कार्य का लगभग पूर्ण मानकीकरण हो चुका है और हर जगह लगभग एक ही प्रकार की प्रक्रिया अपनाई जाती है. फरवरी-मार्च महीने में तेंदू की झाड़ियों का शाखकर्तन किया जाता है और लगभग 45 दिनों के बाद परिपक्व पत्ते एकत्रित कर लिये जाते हैं. पत्तों को 50 से 100 पत्तों के बन्डल में बांधा जाता है एवं लगभग एक सप्ताह तक धूप में सुखाया जाता है.
सूखी गड्डियों को कोमल बनाने के लिये पानी से सींचकर जूट के बोरों में भरा जाता है एवं 2 दिन तक पुनः धूप में रखा जाता है. इस प्रकार अच्छी तरह भरे एवं उपचारित बोरे इनके बीड़ी उत्पादन में उपयोग तक भंडारित किये जा सकते हैं. तेंदूपत्ता की तुड़ाई, उपचार एवं भण्डारण में बहुत सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है. यह एक अत्यंत संवेदनशील उत्पाद है एवं उपरोक्त प्रक्रिया में थोड़ी सी भी गलती या लापरवाही के कारण इसकी गुणवत्ता खराब हो सकती है एवं यह बीड़ी बनाने के लिये अनुपयुक्त हो सकता है.